Sunday, 15 May 2011

अस्वीकृत मध्यम बहु भूमिका लड़ाकू विमान विक्रेताओं ने रक्षा मंत्रालय के वीरुध छेड़ दी जंग

लेखक सुदीप मुखर्जी
कहते है जहां पैसा होता है वहाँ परेशानियाँ और भी अधिक होती है जैसे जैसे हमारे मिग-21 विमान अपने कार्य काल के अंत पर पहुच रहे थे वैसे वैसे भारतीय वायुसेना की चिंताए बड़ रही थी , तेजस जिसपर कई लोगों की आशाएँ थी वह 17 साल बाद अभी भी ठीक से तयार नहीं था अत: वायुसेना ने विदेशी लड़ाकू विमानो के लिए आग्रह किया कई सालों के टाल मटोल के बाद भारत ने $9.5 अरब अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा की घोषणा कर दी , इतना बड़ा अनुबंध शायद ही किसिने देखा था । अम्रीका जो अब अपने को भारत का परम मित्र मानता है तुरंत दबाव बनाने लगा अपने ऐफ-16आईएन सुपर वाइपर और ऐफ/ए-18 सुपर होर्नेट के लिए। उसे लगा की इस नए परिवेश मे भारत उसकी के साथ अनुबंध करेगा।


उधर रूस हमारा पुराना साथी और सबसे बड़ा सैन्य सामाग्री का विक्रेता मिग-35 ले कर तयार था उसे भरोसा था की मिग-21 उड़ाने वाले वायुसेना को मिग-35 भी पसंद आयेगा। क्यूंकी दोनों हवाई जहाज एक ही कंपनी के है अत: भारत को नया कुछ नहीं सीखना पड़ेगा तथा मिग-35 सबसे सस्ता विमान था ।


हाल ही मे हमने इंग्लैंड से बाज़ जेट ट्रेनर खरीदा है और इंग्लैंड के त्यफून यूरोफाइटर का हाल बहुत बुरा था उसके पास कोई खास खरीदार नहीं था अगर उन्हे यह अनुबंध मिल जाता है तो उनकी कंपनी का बेड़ा पार हो जायेगा तो उन्होने भी कमर कस ली ।


फ्रांस इस बात से बहुत खुश था की उसने हमे कई साल पहले मिराज 2000 बेचे थे और राफेल मे भी वैसी ही लेकिन अत्याधुनिक तकनीक का प्रयोग किया गया है उसे भरोसा था की भारत की वायुसेना जो मिराज की दीवानी है वह इस अत्यंत आधुनिक किन्तु सबसे महेंगे विमान को पसंद करेगी।


एक और खिलाड़ी था स्वीडन का गृपेन जो की अत्याधुनिक होने के साथ साथ बहुत ही व्यावहारिक विमान है , उसे हवाई अड्डे के विपरीत किसे भी सड़क पर उतारा जा सकता है ।


सभी ने अपने अपने तरीके से सभी प्रकार के हथकंडे अपना लिए । इंग्लैंड के प्रधानमंत्री से लेकर अम्रीका के राष्ट्रपति तक सबने अपना ज़ोर लगाया । किन्तु अंत मे जो दो विजेता निकले उसके कारण कई लोगों को बहुत अचरज हुया ।

राफेल और यूरोफाइटर बहुत महेंगे और बहुत कम प्रयोग मे किए जाने वाले विमान है  फ्रांस और इंग्लैंड के सिवाए इन विमानो का प्रयोग केवल 3 और देश करते है वह भी इसलिए क्यूंकी इन सब ने मिलकर यूरोफाइटर बनाया था । तथा यूरोफाइटर पूर्णत: बहू भूमिका लड़ाकू विमान नहीं है वह जमीन पर हमला करने मे सक्षम नहीं है और नहीं उसके पास AESA राडार है ।

चार विमान विक्रेताओं ने जिनहे भारतीय वायु सेना के लिए 126 मध्यम बहु भूमिका लड़ाकू विमान (एमएमआरसीए) के $9.5 अरब अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा मे अयोग्य घोषित किया गया था उन्हे यह निर्णय स्वीकार नहीं है। पता चला है की इन चारों ने रक्षा मंत्रालय से लिखित मे पूछा है कि इनके लड़ाकू विमानो को क्यू अयोग्य बताया गया।


सबसे पहला प्रश्न रूस कि तरफ से उसके विमान मिग-35 को लेके था उसके बाद अमरीका के दूतावास ने ठीक ठीक कारण जानने चाहे कि उनके लॉकहीड मार्टिन ऐफ-16आईएन सुपर वाइपर और बोइंग ऐफ/ए-18 सुपर होर्नेट मे क्या कमी थी। ठीक उसके बाद स्वीडन ने भी अपने जंगी विमान ग्रिपपेन के बारे मे भी पूछा है ।


27 अप्रैल को रक्षा मंत्रालय ने इन चारों को एक पत्र मे अपना निर्णय बताया था जिसमे कोई भी जानकारी विस्तार से नहीं दी गयी थी । मजेदार बात यह है कि कानून के हिसाब से रक्षा मंत्रालय तब तक अपना फैसला नहीं सुनाता है जब तक न उसकी अपनी तकनीकी पर्यवेक्षण समिति यह जांच कर लेती है की इस पूरे कांट्रैक्ट मे सारे नियमो का पालन हुया है की नहीं किन्तु इस बार बिना इस समिति के अंतिम रिपोर्ट के ही रक्षा मंत्रालय ने अपना फैसला सबको बता दिया । चरों विक्रेता इसको एक भूल मानते है और उसका फाइदा उठाना चाहते है।


विमानन विशेषज्ञों को भय है कि इस प्रक्रियात्मक कमी का लाभ राजनीतिक रूप से प्रभावशाली विक्रेताओं के द्वारा शोषण किया जा सकता है (इशारा बोइंग और लॉकहीड मार्टिन की तरफ है ) । किन्तु वरिष्ठ वायुसेना अधिकारियों ने अमरीका के दिखावे के दुख का जोरदार विरोध किया है , उनका कहना है के दोनों ऐफ-16 और ऐफ/ऐ-18 दशकों पुराने विमान है और अमरीका ने अपने घमंड मे और हमारी वायुसेना को नीच मानते हुये ऐसे पुराने और हीन हवाई जहाज प्रतिस्पर्धा मे उतारे और अगर वह इतने ही आतुर थे हमारे साथ सौदा करने के लिए तो उन्हे ऐफ-35 मैदान मे उतारना चाहिए था ।


रूसी विक्रेता, आर. ए. सी मिग भी भारतीय वायुसेना अस्वीकृति के साथ परेशान है, लेकिन एक और कारण के लिए। 2000 मिग-21 जो कि दुनिया भर के दसियों वायु सेना में है उनकी सेवा जीवन का अंत हो राहा है । मिग-35 को मिग-21 के प्राकृतिक प्रतिस्थापन के रूप में रूस में विकसित किया गया है. भारतीय वायु सेना जो की मिग-21 का एक गड़ है... अगर वह मिग-35 को खारिज कर देता है, तो यह नकारात्मक संकेत है जो कि यह दुनिया भर में भेजा जाएगा और यही बात रूसी बिल्डर के लिए चिंता का विषय है।


ग्रिपेन भी भारतीय वायुसेना की अस्वीकृति के वीरुध अपील करने के लिए अपनी रणनीति बना राहा है . रक्षा मंत्रालय ने कंपनी को जो पत्र भेजा था उसके अनुसार, ग्रिपेन भारतीय वायुसेना के 51 माप दण्ड मे असफल राहा, जिनमे से 43 महत्वपूर्ण क्रियात्मक इलेक्ट्रॉनिक स्कैन सरणी रडार (AESA) सक्रिय करने से संबंधित है। ग्रिपेन इंटरनेशनल का तर्क है कि उसने भारतीय वायुसेना को "प्रौद्योगिकी का सबूत" दिया था। उसने यह बात साबित कर दिया है कि "ग्रिपेन एनजी सेलेक्स AESA रडार (जो अभी भी विकास्र्त है) प्रौद्योगिकीय बाधाओं को पार कर चुका है और भारत को युद्धक विमान देने के पूर्व इस राडार को विमान पर जोड़ दिया जायेगा। इसका एक बहुत बड़ा कारण है कि सेलेक्स यूरोराडार के साथ साझेदारी में है जो यूरोफाइटर का AESA राडार निर्मित कर राहा है। इस राडार को भारतीय वायु सेना ने तकनीकी रूप से व्यावहारिक माना है, और संभावना के रूप में स्वीकार किया है कि भारत को यूरोफाइटर देने के पूर्व यह राडार पूर्णत विकसित हो चुका होगा । ग्रिपेन का तर्क यह है की अगर सेलेक्स ने भारतीय वायुसेना को साबित कर दिया है की उसने यूरोफाइटर AESA राडार के लिए प्रौद्योगिकी में महारत हासिल कर ली है तो वही तकनीक ग्रिपपेन के रेडार मे भी प्रयोग मे आयेगी तो फिर ग्रिपपेन के रेडार को क्यू असफल माना गया और यूरोफाइटर के राडार को सफल।


लेकिन भारतीय वायु सेना के सूत्रों के मुताबिक ग्रिपेन सबूत देने में असफल रहा। वह यह तथ्य साबित नहीं कर पाया कि उनका AESA राडार समय पर विकसित हो जाएगा तथा हमे देने से पहले उस राडार को लड़ाकू विमान के साथ एकीकृत कर दिया जायेगा। इसके विपरीत, फ्रांस के दस्सौल्ट ने अपने राडार को साबित करने के लिए दो लड़ाकू विमान उड़ाए जिन पर उनका AESA रेडार लगा था जिसके कारण भारतीय वायुसेना को भरोसा है की उनका राडार पूरा होने के करीब है। यूरोफाइटर ने भी भारतीय वायुसेना के मूल्यांकन समिति के लिए एक प्रोटोटाइप AESA राडार लगा कर अपना विमान उड़ाया जिसके कारण मूल्यांकन समिति ने यह माना कि राडार 2014-15 तक तैयार हो जाएगा.


इसी बीच डॉ सुब्रमनियम स्वामी ने घोषणा की है कि सोनिया गांधी ने वायुसेना पर दबाव बनाया और उसे बाध्य किया की वह फ्रांस के राफ़ाइल को चुने। इसमे कितनी बात सच है या झूठ वह तो साबित नहीं हुआ किन्तु स्वामी जी ने भारत के प्रधानमंत्री को एमएमआरसीए की खरीद पर रोक लगा देने का आग्रह किया है ।


कुछ दिनो पहले तक सभी विक्रेतायोन ने भारत एमएमआरसीए की तकनीकी और उड़ान मूल्यांकन प्रक्रिया की प्रशंसा की थी, और यह घोषणा भी कर दी कि यह सबसे पेशेवर प्रतिस्पर्धात्मक खरीद है जो उन्होने पहले कभी नहीं देखि, जाहिर है निर्णय आने के बाद शायद उनका मन बदल गया।


अभी इस अनुबंध मे आगे क्या क्या होगा वह तो भगवान ही जानता है किन्तु यह तो तय है की अम्रीका इस निर्णय को आसानी से नहीं मानेगा और कही न कही इसकी भरपाई करने की कोशिश करेगा